कैसे बदला दलित आंदोलन ग्वालियर के इतिहास के सबसे बड़े दंगों में?

एससी-एसटी एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी न करने और शुरूआती जांच के बाद कार्रवाई करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित संगठनों ने दो अप्रैल 2018 को भारत बंद का आह्वान किया। यह बंद शांतिपूर्ण तरीके से करने की घोषणा थी, लेकिन ग्वालियर के दामन पर यह दिन एक दाग दे गया।
अतीत में ऐसे कई मौके आए, जब देश में अलग-अलग आंदोलन और दंगे हुए, लेकिन उनकी आंच कभी भी ग्वालियर तक नहीं पहुंची। शहर के लोगों ने हमेशा सौहार्द्र का परिचय दिया और कभी भी ग्वालियर की फिज़ा खराब नहीं होने दी। तीन साल पहले दो अप्रैल के दिन आंदोलनकारियों ने मुरार और थाटीपुर इलाकों में हुजूम बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे हाथों में लाठी-डंडे भी नजर आने लगे। इसके बाद शुरू हुआ तोड़फोड़ का दौर। आंदोलन कुछ ही पलों में उपद्रव में तब्दील हो गया। रोड पर चलती बसों, ऑटो-टैंपो को तोड़ा-फोड़ा गया और घरों के बाहर खड़ी कारों को भी निशाना बनाया गया। शर्मनाक स्थिति तब बनी, जब स्कूल-कॉलेज जाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इंतजार कर रही महिलाओं, युवतियों तक के साथ छेड़छाड़ शुरू हो गई। बाइकों पर सवार आंदोलनकारियों की एक टोली दोपहर 12 बजते तक लश्कर क्षेत्र के मुख्य बाजारों को निशाना बनाने के लिए निकली। यह भीड़ इंदरगंज तक पहुंची और यहां मौजूद राजपूत बोर्डिंग में घुसने का प्रयास करने लगी। उस समय बोर्डिंग में करीब एक दर्जन छात्र थे और उन्हें भीड़ की नीयत का अंदाजा लग गया था। छात्रों ने बोर्डिंग से पथराव कर भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश की। इसी बीच पुलिस पार्टी मौके पर पहुंची और आंसू गैस के गोले छोड़कर भीड़ को भगाया। इस बीच थाटीपुर के कुम्हरपुरा इलाके में आंदोलन दलित बनाम सवर्ण का रूप ले चुका था। यहां दोनों गुटों के बीच हिंसक छड़पें और गोलीबारी तक हुई। कुल मिलाकर दोपहर होते-होते ग्वालियर के छह थाना क्षेत्र कर्फ्यू के हवाले कर दिए गए और पूरे शहर में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई। इस पूरे हुड़दंग में राकेश टमोटिया और दीपक जाटव की मौत हो गई और डेढ़ दर्जन से अधिक लोग घायल हुए। बाद में पुलिस ने भीड़ को भड़काने, हिंसा करने जैसी धाराओं में 33 एफआईआर दर्ज कीं। इनमें से 15 मामलों में खात्मा रिपोर्ट भी लग चुकी है और आज तक किसी भी आरोपी को सजा नहीं हुई है।