श्रद्धाभाव से मनाई गई शनिश्चरी अमावस्या

श्रद्धाभाव से मनाई गई शनिश्चरी अमावस्या

फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में शनिवार को श्रद्धाभाव से शनिश्चरी अमावस्या मनाई गई। अमावस्या तिथि 12 मार्च शाम 3:02 बजे से शुरू हो गई, जो 13 मार्च को 3:51 बजे समाप्त हुई। इसे फाल्गुन अमावस्या भी कहा जाता है। अमावस्या शनिवार को पड़ने के कारण इसे शनिश्चरी अमावस्या कहते हैं। इस बार शनिश्चरी अमावस्या पर साध्य योग रहा। सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए अमावस्या विशेष फलदायी मानी जाती है। ज्योतिषाचार्य सुनील चोपड़ा ने बताया कि शनिश्चरी अमावस्या पर शनिदेव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। ग्वालियर शहर में बहोड़ापुर, कटी घाटी, दाल बाजार समेत शहर के अन्य शनि मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि जिन श्रद्धालुओं की कुंडली में साढ़े साती, ढईया या विष योग बना है, वह लोग इस दिन छाया दान करें। शनिदेव पर सरसों का तेल, काले उड़द, काले तिल और जंग लगी कील चढ़ाए, जिससे शनि देव के प्रकोप से शांति मिलेगी। इसके अलावा इस दिन शाम को पीपल के पेड़ के पास सरसों तेल का दीया जलाएं और पीपल के पेड़ की सात परिक्रमा भी लगाएं। ऐसा करते समय अपने पूर्वजों को याद करें। इस दिन भगवान शिव, अग्नि देवता और ब्राह्मणों को उड़द की दाल, दही और पुरी अर्पित करें। हिंदू धर्म शास्त्रों के मुताबिक अमावस्या के दिन पूजा-पाठ और श्राद्ध कर्म एवं पितृ शांति को करने का खास महत्व है। अमावस्या के दिन भगवान का ध्यान करना चाहिए, किसी भी तरह की बुरी लत से दूर रहना चाहिए और हो सके तो अपने सामर्थ्य अनुसार गरीब और जरूरतमंदों को खाना खिलाना चाहिए। पितृदेव को अमावस्या का स्वामी माना जाता है, इसलिए इस दिन पितरों का ध्यान करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म या पूजा-पाठ करें।